A weavers request / एक बुनकर की कहानी

एक बुनकर की कहानी

चंदेरी एक ऐसी जगह जो अपनी ऐतिहासिक इमारतो और खूबसूरत सिल्क साड़ियो की वजह से दुनिया भर में प्रसिद्ध है | खासतोर पर यहाँ की साड़िया आजकल विश्व पटल पर छाई हुई है | इन्टरनेट और सोशल मीडिया ने इस नायाब कलाकारी को और भी प्रसिद्ध बना दिया है | आजकल हर किसी के हाथ में मोबाइल है और हर कोई सोशल मीडिया और इन्टरनेट से ऑनलाइन शौपिंग कर रहा है | इसका फायदा भी है और नुक्सान भी |

क्यूंकि  बुनकर आजकल अपनी साड़िया खुद बेच सकते है उन्हें किसी सेठ या दलाल की ज़रूरत नहीं है | पर इसके कई नुक्सान भी हो रहे है लोग आजकल चंदेरी की प्रिसिधि का फायदा उठा कर चंदेरी के नाम से पावरलूम और फैक्ट्री में बने कपडे को चंदेरी सिल्क बता कर बेच रहे है | जिसकी वजह से चंदेरी के बुनकरों की असली साड़िया अपनी पहचान खोती जा रही है | क्यूंकि पावरलूम और फैक्ट्री में बनी साडी  हैण्ड लूम की साडी से कहीं सस्ती मिल जाती है | पर इसकी वजह से जो लोग इस अंतर को नहीं समझ पाते वो हैंडलूम की साडी को भी उसी नज़र से देखते है | इससे कई बार पावर लूम की साडी हैंडलूम के रेट पर बिकती है मतलब नकली साडी असली साडी के रेट में बिक जाती है और नकली साडी के कम रेट की वजह से असली साडी वालो को अपने रेट कम करने पड़ते है |

इसका सीधा असर उस बुनकर की आय पर पड़ता है जो दिन रात एक करके उस साडी को बनाता है | क्यूंकि अगर साडी कम रेट पर बिकेगी तो ज़ाहिर सी बात है उसको मजदूरी भी कम मिलेगी | पर बड़ी बात ये है की उसको महनत उतनी ही करनी पड़ेगी | और न ही उसके खर्चे कम होंगे |

यही कारण है की आज भी बुनकर उतने ही परेशान है जितने पहले थे |  आज भी बुनकर छोटे छोटे से कमरों में लूम लगाकर रोज़ की 100 -200 रु की मजदूरी तक पे काम करने को तैयार है |

क्या आप सोच सकते है की कई बुनकर इतने छोटे से कमरे में काम करते है की  जहा पैर भी मुश्किल से फैलते है आपमें से कई खरीद दार जो इस साड़ी को खरीदते है उनके बाथरूम  भी उन कमरों से बड़े होते है |

उनके बच्चे फीस की कमी की वजह से स्कूल नहीं जा पाते | और बचपन से ही इसी धंधे में लग जाते है | वैसे भी जिस घर में साडी बनती है तो उस घर का हर सदस्य किसी न किसी रूप से उस काम से जुड़ जाता है |

कोई तानी लगाता है तो कोई राज जोड़ता है | कोई बुट्टी लगाता है | कोई बुनता है | मतलब पूरा परिवार एक ही काम में लगा रहता है और जिसके बदले में उन्हें एक अच्छी ज़िन्दगी तो क्या दो वक़्त खाने की लिए भी सही से नहीं मिल पाता |

सरकार रोज़ नई योजनाये बनाती है रोज़ नई घोषणा होती है पर इनका वास्तविक लाभ बुनकरों तक नहीं पहुँच पाता |

यहाँ ज़रूरत है एक ऐसे सिस्टम की जो इस बात की सही जानकारी रखे की योजनाओं का सही लाभ बुनकरों तक पहुँच रहा है की नहीं और साथ ही चंदेरी कपडे के  नाम पर बिकने वाले नकली माल को लेकर भी जागरूकता फैलाई जाए |

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